Monday, November 5, 2007

आताम्निर्भार्ता

आज मैं क्लास मे सुन रही थी जब एक सह्पाटी बता रहा था कि कईओं का औरतों को शिक्षा देने का इरादा गलत हैं। वह इस लिए कर रहे हैं ताके उस के अच्छे घर मे शादी हो जाए इस लिए नहीं कि औरत का मनोबल और अताम्निभार्ता बडे। स्वतंत्रता ज़रूरी हैं। मैं यहाँ पर बहुत से लोगों को देखती हूँ जिन्हें अपने से काम करना नहीं आता। यह बिलकुल गलत हैं। और इस की भूमिका काम्पुस से बहुत दूर शुरू होती हैं। घर पे। अगर घर आकर सब हमेशा एक साथ बेठे रहें, यह हमेशा कुछ न कुछ करना चाहते हैं तो उनको शांत रहना, उपने मे मस्त रहना यह नहीं आएगा। जैसे जब मैं घर पे थी, घर आकर माँ और बहन के साथ आधा एक घंटा बिताया फिर मैं ऊपर काम करने चली जाती थी। फिर शाम को थोडा और बैठी सब के साथ। फिर सप्ताहांत के मौक़े पर ज़्यादातर पूरा परिवार कुछ साथ मे करता था। लेकिन मुझे हमेशा अकेले और अपने मे मस्त रहना भी आता था।
तो यहाँ आकर भी मुझे अपना रास्ता ढूँढ ना आता हैं। कल मेरी लप्तोप टूट गया, मैं खुद दुकान पर गई। और हिन्दी प्रेजेंटेशन के लिए दूसरा खोजा। प्रेजेंटेशन के लिए भी मैंने किसी की सहिता नहीं मांगी। एक शब्द का हिन्दी शब्द माँ से पूछा। बस।
लेकिन जैसे मैंने कहा इस कि भी शिक्षा देनी पड़ती हैं। माँ कहती हैं कि जब वह बड़ी हो रही थी तो हमेशा कोई न कोई होता था और अकेलापन उनके लिए नई चीज़ थी। क्योंकि यहाँ पर पापा काम पर चले जाते। घर के बाहर शिक्षा पाने से यह भी आता हैं। क्योंकि, जैसे मैं अभ हॉस्टल मैं हूँ तो मेरी ज़िमेदारियां कम हैं। तो मैं थोडी देर के लिए सिर्फ यह सोच थी हूँ कि मुझे क्या करना हैं और करना चाहिए। इस से मुझे मालूम पड़ता हैं कि मुझे क्या अच्छा लगता हैं और यह कैसे कर सकती हूँ। जब मैं घर पर होती हूँ तो मैं पहले बेटी होती हूँ और उस नज़रिये सो सोच न पड़ता हैं। और बाहर रहने से अकेलेपन को कैसे झेलते हैं यह भी सीखने को मिलता हैं।

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