Saturday, November 10, 2007

बोल्लीवुद और अलप-संखयक लोगों

बोल्लीवुद दुनिया का सबसा बड़ा फिल्म इन्ड्स्त्री है। और इसमे बहुत गुण हैं। लेकिन एक मेरी उससे बहुत बड़ी शिक़ायत हैं। वह महिलाओं को केसे पेश करने लगा है। १९९४ के बाद औरतों को वह बहुत असहाए और दुर्बल दिखाते है। आश्चर्य की बात तो यह हैं कि पहले ऐसा कम होता था। १९७०ज़् और १९८०ज़् के हिट फिल्मों मे बहुत औरतों मजबूत हैं और खुद के फैसले लेती हैं। अल्प-संखयक लोगों, जैसे मुसलमानों के पेश मे मुझे ज्यादा फरक नज़र नहीं आया। बस एक भिनता है जो दोनो औरतों और मुसलमानों के चित्रण मे दिखता हैं। आज के कई निर्देशक सफल फिल्म बनाते हैं लोगों को सिखाने के लिए। इस पेपर मे मैं एक यह दो ऐसे फिल्मों का भी ज़िक्र करूंगी। लेकिन, ज़्यादातर फिल्म के विश्लेषण से दिखौंगी कि आज के सिनेमा मे औरतों को दुर्बल दिकाते हैं और यह बुरा क्यों हैं।
१९९४ मे दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे और हम आपके हैं कौन कि सफलता ने इन्ड्स्त्री का हुलिया ही बदल दिया था। दोनो फिल्म ने रेकॉर्ड्स तोड़ दिए थी। और उनकी खास बात? जहाँ और निर्देशकों खून-खराबा, कम कपडे और रंगीली फिल्म बना रहे थी यह दोनो फिल्म परिवार के साथ देखने योग्य थे। दिलवाले मे एक खून-खराबा का सीन है। इस के इलावा दोनो फिल्मो का असर ख़ुशी, संस्कृति और संस्कारों पर है। फिल्म मे लड़कीय हमेशा पूरे कपडे पहनती हैं। एक और भिन्ता। दोनो लड़कियाँ दुर्बल हैं। सिमरन पापा के आज्ञा के खिलाफ नहीं जाएंगी। जब पापा घोषित करते हैं कि वह उनके साथ पंजाब जाकर कुलजीत से शादी करेगी, वह भाग के राज पे पास नही जाते। बल्की सिर्फ रोती है। राज का इंतिज़ार करना परता है। हम आपके हैं कौन मे निशा कुछ नही कहती जब गलती से मैंने हाँ कह दी, मे प्रेम से प्यार करती हूँ। और पे और इस फिल्म मे जो औरत मन की बात बोलती है, वह है मामी और वह खलनायक के रुप मे आती है। पूजा बौजी एक और आदरणीय औरत हैं और वह अपना त्याग करतीं है। तो यह दोनो फिल्मों मे एक समानता है जो इनके बाद फिल्मो पे बहुत असर डालती हैं। और मेरा मानना है कि इस लिए १९९४ के पहले और बाद फिल्मो मे इतनी असामनता है।
१९९४ के बाद सफल फिल्मो मे औरत
दुर्बल हैं और मर्द का इनित्ज़ार करती हैं। कल हो ना हो मे नैना अपने जीवन को सुधार न सकी। अमन आया और उसने सब कुछ ठीक कर दिया। नैना, यह जेनी, नैना कि माँ, सहस क्यों का पर पाए? अमन ने क्या किया, हिमत करके दादी को जेनी का सच बताया। उसने दिमाक लगा कर व्योपार का कुछ उपाए सोचा। रजा हिन्दुस्तानी, जो १९९८ की हिट पिचर है, उसमे राजा बचा चुरा लेता है। करिश्मा क्या कर पाती हैं। एक रिश्ते मे भी लड़कियाँ लड़कों का इंतिज़ार करती हैं। कभी ख़ुशी कभी घाम मे पूजा रोहन कि सहैता करती है लेकिन, उसने जीजाजी के लिए रोहन को क्यों नहीं खोजा? जाया बादमे पाती को ठुकराती है लेकिन पहले वह जानती है कि बेटा अंजली से प्यार करता है पर वह सगाई के रस्मों को आगे बढ़ने देती है। यह सिर्फ मैं नहीं कह रही, रीडिफ़.कॉम ने कुछ दिन पहले लिखा था कि हीरोइन कितनी दुर्बल हो गईं हैं।
यह पहले नही होता था। अगर आप राम लखन देखेंगी तो इसमे कुछ और ही होता है। जहाँ जाया पती के गलतीयों को चुप चाप सहन करती हैं गीता, डिम्पल, आगे बढ़ के कुछ करती है। हर फैसले मे मदद करती है। यहाँ तक की जब राम और लखन लड़ते होते है वही लड़ाई रोकती है। और उस कमरे मे मर्द भी थे। लेकिन गीता ने उनका इंतिज़ार नहीं किया। वह आगे बढ़ी। इस हे फिल्म मे माधुरी ने भी अपे बाप के गलत फैसला का विरोध किया और "राम जी बड़ा दुःख दीना" गाने से अपने से निर्णे लिया और कुछ किया। कभी कभी मे भी नीतू सिंह ने अपने से निर्णे लिया और चल पडी माँ को ढूँढ ने। प्रेम रोग मे बड़ी माँ दो तीन बार मर्द के फैसले को ठुकरा गयी। तो औरतों को दुर्बल दिखाना नई बात है।
पहले कभी कभी मर्दों को दुर्बल दिखाते थे। कभी कभी, यह फिल्म सोचने योग्य है क्योंकि यश राज फिल्म्ज़ जिसने दिलवाले बनाया और आज कल बहुत सफल फिल्मों के पीछे है, इस मे अमिताभ खलनायक है। वह बीता हुए कल को नही छोड़ पाटा और उसको औरत की जारूरत होती है। चांदनी मे भी ऋषि कपूर को श्रीदेवी की मदद चाहिए। और जहाँ कल हो न हो मे नैना, दिलवाले मे सिमरन, रो कर कुछ नहीं करती, लम्हे मे विरेन रोता है घाम करता है, लेकिन कुछ नहीं करता।
अलप-संखयक लोगों को भी ठीक पेश किया जाता था। लेकिन एक चीज़ है- उन्हें कम दिखाया जाता था। यह ठीक है और बुरा भी। ठीक है क्योंकि इस का मतलब है बुरा तो नहीं दिखा रहे। और बुरा क्योंकि वह भी हिंदुस्तान का हिससा हैं। अगर हम कह सकते की इस के वजह है कि लोग धर्म के बारे मे सोचते ही नहीं थे इस लिए उन्हें दिखाया नहीं जाता। इस वाद-विवाद मे मैं कुछ नहीं कह सकती। लेकिन जो बाकी हिंदुस्तान मे हो रहा था, धर्म के नाम पर खून-खराबा हो रहा था, बोलीवुड उससे बेखबर नही था, इस से लगता है कि कोइ और ही कारन था। लेकिन जिन फिल्मो मे दिखाया है ठीक दिखाया है। अमर- अक्भर अन्थोनी मे तीन बडे मज़हब, इसाई, मुसलमानों और हिन्दुओं को दिखाया था। तीनों अछे थे। और तीनो के धर्म को छुपाया नहीं गया। एन्थोनी ईसाई धर्म का चिह्न लगाता है। और एक गाना मे तीनों अपने धर्म का एलान करते हैं। मुझे यह अच्छा लगा।
एक बात है जिससे लगता है कि अभी चीजे पूरी तरा बिगडी नहीं हुई। आज कल बहुत लोग कर्मण्यतावादी फिल्म बना रहें हैं जिसका मकसद है दिखाना कि क्या हिंदुस्तान मे बुराएया है जो सुलझाने चाहिए। और मे सिर्फ सफल निर्देशकों के फिल्मो के बारे मे बात करूंगी कारण बाद मे बताया जाएगा। राजकुमार संतोषी ने लज्जा बनाई। इस फिल्म मे साफ दिखातें हैं कि bhaarat मे औरतों पर क्या ज़ुल्म हो रहें हैं। चक दे मे दोनो, मुसलमानों पर क्या ज़ुल्म हो रहे हैं वह दिखाते हैं और महिलाओं के समस्याओं के बारे मे बात करती हैं।मिशन कश्मीर मे मुसलमानों पर क्या बीतती है इसके बारे मे बता ते हैं। असल मे मिशन कश्मीर मे बहुत बुरा हो सकता था। क्योंकि बहुत लोग सोचते हैं कि सब मुसलमान आतंकवादी हैं। लेकिन इस फिल्म मे साफ दिखाते हैं कि इस्लाम आतंकवाद की इजाज़त नही देता। और एक सीन, जहाँ पर खान, संजय दत्त, और एक आईएस वाला बात कर रहे होते हैं, खान पर आरोप लगाया जाता है कि वह आतंकवादी है। और वह गुस्सा हो जाता है और कहता है कि यह इस देश की बद्किस्माती है कि बहुत सालों से गोली खाते आदम पर आतंकवादी होने का इलजाम इस लिए गाया जा रहा है क्योंकि वह मुसलमानी हैं। तो यह बात अच्छी है। लेकिन ऐसी फिल्मों की पहुंच कम होती है। इस लिए दूसरे फिल्मो का सुधार आवश्यक हो जाता
हैं।
यह बहुत ज़रूरी क्योंकि फिल्म लोगों पर बहुत अससर करते हैं। एक वजह है भारत कि अनपढ़। रामानंद सागर के रामायण मे अरुण गोविल ने रामचंद्र को पेश किया। उन्होने कहा कि इस के बाद कई लोग, खासकर गाव मे उनको सच मे भगवान मानने लगे। गोविल भगवान नहीं। लेकिन कई लोग जो ज्यादा जानते नहीं थे उनको फरक पता नहीं चला। मैं यह कहानी इस लिए दोहरा रहीं हूँ ताके आप को पता चले कि फिल्मों का क्या असर होता हैं। इस असर के कारण ही यह प्रोजेक्ट का कुछ महत्त्व है। इस प्रोजेक्ट मे दिखाया गया है कि निर्देशक को सोचना चाहिए कि वह क्या कह रहें हैं फिल्म मे। अभी हिन्दुस्तान मे बड़ी केस हुई थी, क्योंकि रेडिफ के मुताबिक धूम, यश राज की हित फिल्म, के बाद चोरियाँ बड़ गयी और चोरों ने जॉन एब्राहम, जो फिल्म का एक हीरो है, उसके बालों कि नक़ल की। कई लोगों ने इस के लिए यश चोपडा को उत्तरदायी ठराया। उसने कहा कि मैंने सिर्फ फिल्म बनाई। इस तर्क कि सीमा है, लेकिन यह पूरा सफाई नहीं हो सकता। निर्देशक को सोचा चाहिए। और इस लिए मई समस्या बताने मे इतना वक्त बिता रहीं हूँ।
यह पेपर बताता नहीं है कि महिलाओं को बुरी
तरा पेश क्यों किया जा रहा है। आश्चर्य कि बात तो यह है कि औरतों को दुर्बल, रोता हुआ, और मर्दों पर निर्भर १९९४ हे काड ही पेश किया जा रहा है। एक बदलाव का कारण है दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे और हम आपके हैं कौन। यह दोनो पिक्चरों ने रेकॉर्ड तोडके कमाया। तो शायद इसके बाद निर्देशकों ने सोचा कि यही दर्शादोक चाहते है। लेकिन उनका भी कओई ज़िमिदारी है। उनके पता होना चाहिए कि औअर्तों को ऐसे पेश करने से लोगों सोचने लगेंगे कि औरतों इसी के काबिल है। वह यह नहीं जान पाएँगे, कि जैसे अमर अख़बार एन्थोनी मे नीतू के बहुत रंग थे, वैसे बहुत औरतों के हैं। वह घर भी चला सकती हैं, काम भी कर सकती हैं और लड़ भी सकती हैं।

No comments: